Monday, 15 April 2013

मेरा बचपन बिक रहा है...

जाओ तुम भी
अपनी किस्मत आजमाओ...
लगा सकते हो तो
कीमत लगाओ...
वो घर नहीं
मेरा बचपन बिक रहा है...

हर सांस हर लम्हा
जिंदगी बिक रही है...
पर तुम तो जा रहे हो
मेरे हाथों की लकीर बेच कर...
हर पल हर सांस को छीन कर
तो जाओ...
जाओ तुम भी
अपनी किस्मत आजमाओ...
लगा सको तो
कीमत लगाओ...

(27-11-2012 को नेहा द्वारा लिखी ये कविता)

No comments:

Post a Comment