रात रात भर जागी थी वो
जब तूं गहरी नींद में सोई
आज तुम्हें जगा कर वो
उसी नींद में सो गई
उसके नींद के सपने जब
दिल पर करता है वार
तेरे आंखों के क्षितिज पर
होता कई सावन बर्बाद
देख तेरे इस नक्श की सूरत
विचलित होता मन हर बार
हर बार निकलता एक ही सार
चुप हो जाओ...चुप हो जाओ...
जानता हूं...समझता हूं...
मेरे इन शब्दों का मेल
करता है तुम को आघात
कम नहीं कर सकता तेरे गम को
पर तेरी आंखों की नमी में
छू सकता मैं उस कमी को
हर क्षण हो के भी नहीं तूं
होती हर पल मेरे पास
उसके दीदी में हर पल खोती
पल पल भर का हर पल साथ
वो तो यहीं है देख रही है
बादल की घटाओं की छिट पुट
टुकड़ों से
धूप छांव की बीच खड़ी वो
देख रही तेरी सूरत का रंग
तूं रोती है तो वो भी रोती
है
बदलों की घनेरी घटाओं से
तूं हंसती है तो वो भी
हंसती हैं
पुरबैया पवन की झोंको में
एक टक निगाहों से देखती वो
तुझको अपनी बांहों में आज
भी
दूर ना कर उसको खुद से
बहां के अपनी आंखों से उसको
छोड़ खुद को खुदी में
अब वो तुझ में समाई है
सोई नहीं वो अब तो जगी है
तेरी चाहत की नए सबेरे में
सांझ हुई तो थक कर दिन भर
सोई है तेरी बांहो के भीतर
सोई नहीं वो अब तो जगी है
तेरी चाहत की नए सबेरे में
साभार- नेहा
प्रणव झा
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