Thursday, 7 August 2014

घर-घर घूम रहा है रावण





घर-घर घूम रहा है रावण
सीता को कौन बाचाएगा
राम नहीं है इस जंगल में
लक्ष्मण भी ना आ पाएगा
वही द्रौपदी वहीं दुशासन
पर वो कृष्ण नहीं आएगा
चीर पड़ा है बदन से नीचे
उसको कौन उठागा
घर-घर घूम रहा है रावण
सीता को कौन बचाएगा...

चीख टकरा कर मर जाती है
बहरे इन दीवारों में...
मुर्दा जिस्म लटक जाता है
जब भारत के इन गांवों में
उठो सीता की अब खुद लड़ो
ना तुम्हें कोई बचाएगा
पुरूषोत्म के देश में अब ना
कोई पुरुष यहां आएगा
घर-घर घूम रहा है रावण
सीता को कौन बचाएगा...।

बिन जुए के दाव पर लगती
हर दिन अब यहां द्रौपदी है
सिंहासन पर बैठा है अंधा
उसे ना चिंता तुम्हारी है...
उठो दौपदी अब खुद लड़ो
अब ना माधव यहां पर आएगा
घर-घर घूम रहा है रावण
सीता को कौन बचाएगा...।

उठो की तुम को उठना होगा
अपना चीर संभालना होगा
दु:शासन को ललकारना होगा
अंधों को भगाना होगा
उठा सीता की लंका दहन करो
क्योंकि यहां ना हनुमान आएगा
जो तुम्हें बचा ले जाएगा
घर-घर घूम रहा है रावण
सीता को कौन बचाएगा....।

No comments:

Post a Comment