बागों
के झूले वो रेतों के घर
खव्बों
की दुनिया वो कागज के फूल
उतरती
नहीं वो बचपन की यादों के धूल
वो रातों
को जब छत पर आसमान की तरफ देखते हुए सोया करते थे तब पता नहीं आसमान के असंख्य तारों
के बीच कहां चले जाते थे और फिर कभी तारे को
गिनते तो कभी तारे को तारों से मिला कर एक लकीर खींचते। चांद के अंदर झांकते और उसके
दागों पर कई काहनी सुनते और जब अकले में चांद को निहारते तो उस काहनी को चांद में ढूंढते...।
ऐसा
लगता है सपना था यह सब... अचानक नींद खुल गई है। मन नहीं करता इस नींद से जागने का...ये
बचपन की यादों की नींद है जो बस अब यादों में सिमट कर रह गई है। हमने अपना बचपन जी
लिया। अब बस उसे कभी बंद आंखों से तो कभी खुली आंखों से देख सकते हैं....। एक सपना
बन गया बचपन।
वक्त
की चढ़ान पर
उम्र
की ढालान पर
खो गए
हैं खो रहे है
बन गए
वो याद सब
सौ बहाने
होते थे जब स्कूल नहीं जाना होता था..। बीमार तो कभी भी हो सकते थे..। स्कूल की लास्ट
घंटी की आवाज मन की मुराद सी होती थी। घर आते ही किताबों को किसी बोझ की तरह फेंक कर
खेलने के लिए निकल जाते थे। पीछे से एक आवाज रोज आती थी अरेरेरे...पहले खाना तो खा
लो फिर चले जाना लेकिन किसे परवाह था कि मां मेरे लिए ही बोल रही है खाने के लिए...।
रात को लालटेन की रौशनी तो कभी बिजली की चमक में जब भी किताब आंखों के पास आती मानों
नींद का सैलाब उमड़ पड़ता और कब हाथों में रखी किताब नीचे गिर जाती पता नहीं चलता फिर
मां के जबरदस्ती उठा कर खाना खिलाना और बे-मन से पूरा खाना नींद में खाना। वक्त रेत
की तरह ऐसे फिसला कि समझ नहीं पाए कब बड़े हो गए।
लेकिन
अब जब बड़े हो गए तो पता चला कि बचपन क्या होता है। एक ऐसा दौर जो गीली मिट्टी के समान
होता है उसे उस वक्त जिस सांचे में ढाल दो वो वैसा ही ढल जाएगा। लेकिन इस मुल्क में
हर किसी का बचपन ऐसा नहीं होता। आज वक्त भी बदल चुका है और दौर भी...जहां भगवान से
लेकर इंसान तक की कीमत तय हो वहां उम्र की कीमत ना हो ये हो नहीं सकता। जी हां, आज
बचपन भी बाजार में बिक रहा है।
जो उम्र
पीठ पर किताबों के बोझ को ढोने का होता है आज उसी मुल्क में लाखों पीठ कचड़े का बोड़ा
और सामान ढो रहा है। जो आंख खव्बों के बुनने के लिए होती है वो आंख जागती रातों में
सड़कों के किनारे रात को खत्म होने का इंतजार करती है ताकी सुबह हो तो कुछ खाना मिल
जाए। जो नाजुक हाथ पेंसिल पकड़ने के लिए होता है उसकी नाजुकता बर्तन के ढेर को साफ
करने में खत्म हो रहा है। क्योंकि आज बचपन बिक रहा है।
राजधानी
दिल्ली या भारत के ऐसे सभी शहर जहां लोगों की भीड़ ज्यादा है वहां हर गली मुहलों में
बच्चे यूं ही घूमते नजर आते हैं कोई भीख मांगता तो कोई कबाड़ी में अपनी जिंदगी तलाशता...रेल
के प्लेटफार्म से लेकर बोगी तक में बच्चे कभी कुछ करतव करते नजर आते हैं तो कभी गुटका
बीड़ी बेचते। चमकते शहरों के हर दुकानों और
मकानों में एक ना एक ‘छोटू’ मिल
ही जाता है। कभी घर में झाडू लगता तो कभी होटल का टेबल और बर्तन साफ करता।

शहरों
में कई ऐसे गिरोह हैं जो गांव-घर से बच्चों को फंसा कर लाते हैं और उसे बेच देते हैं,
उससे भीख मंगवाते हैं उसका शारीरक शोषण करते हैं और कईयों को विदेश भी सप्लाई कर देते
हैं। जो उम्र खेलने कुदने का होता है उस उम्र में उससे वयस्कों वाला काम करतवाते है।
नशे की लत लगावा कर उसके दिमाग की शक्ति को खत्म कर देते हैं। क्योंकि वो उसे बच्चा
नहीं खरीदा हुआ गुलाम मानते हैं। क्योंकि आज बचपन बिक रहा है।
सच्चाई
कड़वी होती है चाहे वो जिस रूप में हो। यहां हर उजली तस्वीर के पीछे एक काली तस्वीर
है। जहां कुछ भी नहीं है ना आशा ना ही उम्मीद जिदगी जिसका कोई मतलब नहीं...एक सूखा
हुआ समंदर जिसका रेत भी ऐसा नमकीन हो कि घाव पर लगने के बाद दुगनी तड़प देता है। अगर
आज चाचा नेहरु होते तो क्या भारत के इस भाग्य को देख पाते या फिर वो भी बंगलों के आंगन
में खेलते बच्चों को ही देखते जो इसलिए सुकून से अपने मां-बाप के साथ खेल रहा होता
है क्योंकि उसी की तरह एक बच्चा उसके घर का सारा काम निपटा रहा होता है।
वो रो
रहा था कि उसका खिलौना कबाड़ हो गया
(दूसरा)
वो हंस रहा है कि कबाड़ी में आज खिलौना मिल गया....।Pranav Jha


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