Friday, 27 September 2013

इस शहर को गांव बना देता


इस शहर में
दौड़ती सड़कों पर रुक जाता हूं एक पल
सोचता हूं यूं खड़ा
काश मैं ये रौशनी बुझा देता और
इस शहर को गांव बना देता...
गांव जहां हिंदुस्तान रहता है
देश का दिल बसता है...
इस शहर में
छत पर खड़ा देखता हूं जब दूर
निगाहें इमरतों से टकरा रो पड़ती है
और कहती है
काश मैं इमारतों को गिरा सकूं
देख सकूं खेत खलिहानों को
जहां अन्न उपजता है...
लहलहती है फसले सोने सी
जहां की मिट्टी सोना देती है
तो जीता है हिंदुस्तान...

इस शहर में मैं जब भी निकलता हूं
एक सोच में डूब जाता हूं...कि
ये शहर कितना हंसता है...कभी रोता नहीं!!!
पर आंसू जो निकलता है हंसी से
वो किताना झूठा है और
हंसी कितनी फीकी...
वो आंसू हंसी का नहीं दर्द का है...
धुटन का है...।
और चलती सड़को पर सोचता हूं यूं खड़ा
काश मैं ये रौशनी बुझा देता और इस शहर को
गांव बाना देता...।
गांव जहां हवा स्वछंद है...नदियां गाती है...
चिड़यों की चहचहाहट से
भोर होती है...।
आज भी जब इस शहर में
जब भी खिड़की पर खड़ा होता हूं
उस हवा को महसूस करने के लिए
जो हवा पेड़ के पत्तों को छू कर
खिड़की से मेरे घर आती थी...
काश इस शहर में भी मैं
पेड़ों का झुरमुठ लगा पाता
और हवाओं का रुख गांव से
शहर की ओर कर पाता


और इस शहर को मैं फिर से गांव बना देता...।

Pranav Jha

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