मुझ से रुखसत हो के तुम तो
चले गए
पर छोड़ गए बरसे हुए बादल
का एक टुकड़ा
एक परछाई एक वक्त जो आ भी
रुका हैं
वहीं जहां तुम मुझे आखरी
सांस दिए
आईने की वो तस्वीर वहीं
खड़ी है
जहां तुम उस दिन अपने
जुल्फों को जुरे से आजाद की
जुल्फ तो आजाद हो गया था उस वक्त
पर वक्त वहीं ठहरा है आज भी
इंतजार में
तुम तो चले गए शामों सहर की
जद्दोजहद से आजाद हो के
पर आज भी तेरे होंठे के उस
लाली से मेरा सवेरा होता है
और तेरे आंखों के उस काजल
से रात का अंधेरा होता है
आज भी तुम्हारी चुड़ियों के
टुटने की आवाज घर के हर दिवार से टक्कराती
और आज भी वो टुकड़ें वहीं
बिखरे हमरे उस पल के फसाने कहते हैं
बेमंजिल इस राह में चलते
हुए एक हवा आती है पास मेरे
देखने के लिए कि तुम्हारी
याद की परछाई है या नहीं
पर नदां है वो ये भी नहीं
समझती
याद तो उसे करते हैं हम
जिसे भूलने की कोई गुंजाइश हो
इस जिस्त में हम तो सांस
लेते हैं तेरे बगैर
पर क्या इस सांसों की रवानी
को ही जिंदगानी कहते हैं...।
यूं तो इस जिनत से रुखसत के
लिए
तेरी यादों का एक पल मिटना
ही काफी है
पर जिंदा रहने के लिए तेरा
एक अहसास जरूरी है...।
Pranav Jha
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