आसमां सुर्ख है..हर चीख भी
खामोश है
पर सन्नाटे के इस शोर का
रहनुमा कौन है
लाशों की ढेर पर सोया वह
पूछ रहा
इंसा के जिस्म पर लगे इस
दाग का गुनेहगार कौन है?????
वो रात इतनी काली थी कि उस
रात की सुबह हो नहीं रही...। आंसुओं की जीख और भूख की तड़प जब चट्टानों से टकराई
तो सांस थम गई...और कल तक एक हंसता गाता परिवार बस तस्वीरों में सिमट कर रह
गया...। आंसुओं के सैलाब का तस्दीक कर रही पथराई आंखों की पलके..... बस मानो कह
रही हो कब आओगे घर...। पर इस विकल आवाज को सुनने बचा ही कौन ना तो इंसान और ना ही
भगवान...।
देवो की भूमि उत्तराखंड जब
खंड-खंड हो रहा था तब देवताओं के अस्तिवत्व को लेकर इंसान की जेहनियत में भी एक
जोर दार सवाल उठ रहा था...। आखिर देवो की इस पावन नगरी में देवता कहां है...। जिस
भगवान का नाम लेकर इंसान भवसागर को पार करने की बात करता है आज वो भगवान कहां जा
के सो गए कि अपना और अपने भक्तों की नैया को डूबने से नहीं बचा सकें...देवभूमि में
पावन धरती केदारनाथ के नाथ तो बच गए पर नाथ को नाथ बनाने वाला अनाथ हो गया...।
चट्टानों के गर्भ से निकले
महाविनाश ने जब अपनी लीला देवो की भूमि पर मचाई तो वहां एक भी परिंदा नहीं बचा जो
इस विनाश की विभिषका का हाले-ए-बयां कर पाए...। दुनिया ने जब पहली बार वहां की
तस्वीर देखी तो दिखा बस इंसानी लोशों का ढेर...। ना तो कहीं से चीख आ रही थी ना ही
पुकार बस सन्नाटों की शोर से हर दिशा हिल रहा था
खुशहाली कब आंसू में बदल गई
और आंसू कब खामोशी में ये पता भी नहीं चला...पर जब आंख खुली तो दुनिया के सामने
तस्वीर पूरी तरह से बदल गई थी...। कल तक नोएडा का जो ओमकार अपने घर के सदस्य को
अपनी आंखों से दिदार करता था आज वो अपने खामोश आंखों के साथ परिवार का फोटो हाथ
में लिए बस यही कह रहा कि घर कब आओगे...।
जब जिंदगी के सामने भूख मौत
बन कर खड़ी हो तो इंसान और जानवर के बीच अंतर मिट जाता है...यही हाल-ए-बयां जिंदगी
की जंग जीत कर लौटे एक सैलानी ने कहा जब वे भूख को मिटाने के लिए चट्टान पर उगी
घास खा कर अपनी जान बचाई...।
चट्टानों के बीच में आज भी
बची और फंसी जिंदगी बस एक ही पुकार कर रही है कोई तो जान बचा लो....सब खत्म हो
गया...।उत्तराखंड के आसमां में फटा बादल हिंदुस्तान के हर कोने में जा कर आंसू बन कर
बरसा...।देश के हर कोने से भगवान की अराधना और पुण्य की चाहत में आए भक्त को क्या
मालूम था कि भक्ति करने का इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी...। और भगवान का ये दर्शन
इस बार मोक्ष का ही रास्ता खोल देगा...। मौत की हवस से बची जिंदगी की बस एक ही आस
है कि कोई तो आए जो उसे बचा कर उसके अपनो के पास लेकर जाए...। सरकार की नाकामी के
बाद जब मोर्चा सेना ने संभाली तो कही से भी बची जिंदगी के जान में जान आई....। और
सेना ने इस दुर्गम इलाके में अपनी जिंदगी का परवाह किए बिना हजारों जिंदगियों को
बचाया और बचा ने में लगातर लगी हुई है...। और पूरे देश की जुबां से एक ही लब्ज
निकल रहा सेना को सलाम....।
मौत का सामना कर लौटी कुछ
जिंदगियों से जब पूछा गया हाल तो उसके हाल सुन कर रूह सिहर उठी...। लाशों के बीच
में भूख गंदिली हवा और पानी के साथ लगातार चार दिनों तक जिंदगी गुजारना क्या होता
है ये इन लोगों के सिवा और कोई नहीं जान सकता है...। जिंदगी की जंग जीत कर जो लौट रहे
वो अपने घर तो आ गए पर अपनी जिंदगी को छोड़ कर...लखनऊ का आशिष जब अपने घर से
उत्तराखंड गया था तो उसका पूरा परिवार उसके साथ था पर जब वो मौत को मात देकर अपने
घर लौटा तो अकेला....। जान तो बच गई पर जीने के लिए कुछ नहीं बचा...। उसकी आंखों
से आंसू की बाबसता बस यही पूकार रही है कि...कब आओगे घर...।
बहुत गुस्सा आता है इस मंजर
को देख कर पर सोचता हूं गुस्सा किस पर कुरूं तो....जुबान और अंतरमन खामोश हो जाता
है...हम लाख कहे कि हम बुरे नहीं अगर हम बुरे हैं तो मेरी आत्मा उस बात की गवाही
देती है और हमें बार-बार यही कचोटती है कि तुम बुरे हो तो बुरे हो चाहे लाख कोशिश
कर लो...इस बात तो झूठ नहीं ठहरा सकते....।
आखिर इस तबाही का गुनेहगार
कौन है...क्या सच में ये आसमानी आफत थी या फिर इंसान के हाथों ही बोया वो खुजूर का
पेड़ जो कभी आम नहीं आ सकता....। क्या कुदरत की खामोशी को इंसान ने उसकी कमजोरी
मान लिया था...। कुदरत कुछ बोलती नहीं मतलब क्या वो कुछ समझती नहीं....। प्रकृति
के सामने इंसान की औकात क्या भगवान की भी नहीं चल पाई कभी...। हम क्यों भूलते हैं
जापान में आई उस सुनामी को हम क्यों भूलते हैं हर हमरे देश के अलग अलग हिस्सों में
आई बाढ़ को जिस शहर को हम पूरे शिद्दत से सजाते हैं उस शहर को उजाड़ने में बाढ को
एक पल भी नहीं लगता...इन सब को देख कर हम क्या कहेंगे क्या ये आसमानी आफत है..नहीं
ये आसमानी नहीं ये इंसान के द्वारा ही की गई उसके गुनाहों की सजा है....।
लोभ और लालच सबसे बड़ी घातक
चीज होती है और इंसान कभी भी इस चीज से बच नहीं सकता....। वो अपने तथाकथित विकास
के लिए सारे कानून कायदे को भूल जाता है और अपने विकास के पागलपन के धुन में वो क्या
क्या करने लगता है उसे मालूम भी नहीं होता...। वो कुदरत के हर कायदे कानून को ऐसे
ठेंगा दिखाता है जैसे कुदरत जनता हो और इंसान सरकार...वो कुदरत का पुरजोर शोषण
करता है और फिर लोकतंत्र की तरह ही परिणाम भी आता है जब जनता अपने पर आती है तो
सरकार का पत्ता पत्ता शाख से नीचे गिर आता है...।
हमें फिर से सोचने की जरूरत
है कि हम क्यों उसी डाल को काट रहे हैं जिस डाल पर हम अपना आशियाना बनाए हैं...।
हम सब कुछ समझते हुए भी सबकुछ देखते हुए भी अंजान क्यों हैं हम सोचते तो हैं पर
करते क्यों नहीं....। हर बार हम क्यों आंसू और लाशों के साथ कसम खाते हैं और जैसे
ही आंखों से आंसू सुखती है सारे कसमें वादे भूल जाते हैं और फिर से गुनाहों की दल
दल में जा फंसते हैं...। पर कुदरत तो कुदरत है हम उसके बच्चें हैं हम गुनाह करते
हैं वो सजा भी देती है पर रखती तो वो हैं हमेशा अपनी आंचल में छुपा कर...वो हमेशा
सोचती है और इंसान से हमेशा यही कहती रहती है कि मेरे बच्चों कब आओगे घर....।
प्रणव झा
25-06-2013
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