मैं हिन्दी हूं
तुम्हारी पहचान, संस्कृति
तुम्हारा संस्कार हूं
मैं हिन्दी हूं
तेरे घर में खाती हूं, खेलती हूं
जीती हूं
मैं ही तेरी सांस हूं
मैं हिन्दी हूं
पर आज मैं बीमार हूं
लाचार हूं
अपने घर में ही गुमनाम हूं
तेरी बेरुखी से. जड़ता से, खोखले पन से
मैं अतिरंजित हूं, विकल हूं
कुंठित हूं
मैं हिन्दी हूं
जिसके पीछे तूं दिवाना है, अंधा है
सब कुछ भूला है
वो तेरा नहीं
बेगाना है
मैं ही तेरी वजूद हूं, जमीर हूं
आधार हूं
मैं हिन्दी हूं...
तेरे इसी व्यवहार से, सोच से
मानसिकता से
मैं हतप्रभ हूं, छुब्द हूं
शर्मसार हूं
मैं हिन्दी हूं...
तूं मुझे पहचान
तुझे दुनिया पहचानेगी
यही श्वाशवत है, यतार्थ है
सर्वभौम है
मैं ही तेरी आन हूं, शान हूं
तुम्हारी पहचान हूं
मैं हिन्दी हूं... हिन्दी....
प्रणव झा
तुम्हारी पहचान, संस्कृति
ReplyDeleteतुम्हारा संस्कार हूं
मैं हिन्दी हूं
बहूत खूब...