यूं तो ये अजूबा ही
हुआ था कि 6 दिनों तक मौत के बर्फ की चादर के अंदर रह कर भी मौत की जीत को
सुनिश्चित नहीं किया और जब सबके सामने आया तो पूरी दुनिया को अचंभित कर दिया।
लेकिन जंग अभी जारी था। लांस नायक हनुमंथप्पा ने नायक की तरह जिस्म के हर हिस्से
की जान की बाजी लगा दी।
जहां खबर थी कि
सियाचिन के बर्फीले तूफान में देश के 10 जवान शहीद हो गए वहीं लांस नायक के जिंदा
होने के बाद लोग चमत्कार को नमस्कार करने लगे। लेकिन मौत से जंग जारी रहा, आखिरकार
हनुमंथप्पा के शरीर ने काम करना छोड़ दिया, डॉक्टर ने आशा छोड़ दिया और नायक ने
दुनिया छोड़ दिया। लांस नायक हनुमंथप्पा शहीद हो गए और हिंदुस्तान के इतिहास में हमेशा
के लिए अमर हो गए।
लांस नायक
हनुमंथप्पा की इस शहादत पर आज हिदुस्तान रोया नहीं लेकिन आंखें नम जरूर हो गई। हम
हिंदुस्तानी बहुत भावुक होते हैं हम खुशियों में भी रो देते हैं। हनुमंथप्पा की
शहादत ने हिंदुस्तान के दामन को और चमकदार कर दिया क्योंकि आज यहां कि मिट्टी अपने
आप पर इतरा रही है कि उसने लांस नायक जैसे महावीर को पैदा किया जो उसके दामन को
महफूज़ रखने के लिए खुद को उसी मिट्टी में मिला दिया।
दामन महफ़ूज़ रखने
को
रख दी तूने हथेली पर
अपने प्राण
भूल नहीं पाएंगे इस
बलिदान को
जब तक जिस्म में है
मेरे जान
(लांस नायक
हनुमंथप्पा अमर रहें)
No comments:
Post a Comment