ये लड़ाई कोई आज की नहीं है इस लड़ाई
को लड़ते हुए सदियां गुज़र गई। लेकिन इस लड़ाई में जितनी सफलता मिली उससे कहीं ज्यादा
इसकी महत्वकांक्षा भी बढ़ती गयी। आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जिसे सरकार ना तो निगल
पाती है और ना ही इसे छोड़ पाती है। समय के साथ आरक्षण की मांग हमेशा होती रही है
लेकिन इस मांग का जो तरीका आज दिख रहा है उससे तो लगता है कि मांग को मानने तक देश
कई साल पीछे चला जाएगा। अब वो दौर नहीं जब मांगें मनवाने के लिए सत्याग्रह किया
जाता था, अहिंसक आंदोलन किए जाते थे लेकिन सियासत की बढ़ती ताप और लोगों को सरकार
की तरफ से बढ़ती उदासीनता ने मांग मनवाने के तरीके को पूरे तरह से बदल कर रख दिया
है। हिंसा, लूट-पाट, आगजनी की राह पर आंदोलन चली जा रही है।
अगर हम आरक्षण के इतिहास में डूबेंगे
तो निकलते-निकलते बहुत समय लग जाएगा तब तक देश
की तस्वीर आरक्षण की इस फैली आग में पूरी तरह जल जाएगी। इसलिए हम वर्तमान की बात
करेंगे। पहले हमने गुजरात के पटेल समुदाय को देखा और अब हरियाणा के जाटों को। बात
अब यहीं तक नहीं रही। राजस्थान के जाट भी सड़कों पर आ गए। लेकिन द्रोह के इस
कालखंड में जब देशभक्ति और देशद्रोह की परिभाषा तय की जा रही है वहां इस आरक्षण के
मुद्दे पर देश को क्षति पहुंचा रहे जाट समुदाय पर भी इन परिभाषा का असर पड़ना
चाहिए। खैर, ये तो निति-निर्माताओं
का काम है लेकिन हर्दिक पटेल पर देशद्रोह का मुकदमा कर के पटेल आंदोलन को एक हद तक
चुप करा दिया गया लेकिन अब बात ये है कि क्या सरकार जाटों के सामने झुकेगी या फिर
पटेलों की तरह इसके साथ भी व्यवहार किया जाएगा। अगर जाटों के रार पर झुकेंगे तो पटेलों
को पोटली क्यों नहीं देंगे?
लेकिन बात अगर जाट और पटेल तक होती
तो भी ठीक थी लेकिन आरक्षण का जिन्न हमेशा से इस मुल्क को सताता रहा है। लेकिन अगर
दबाव के बल पर ही आरक्षण संभव है तो हर जाति में युवा और किसान लोग है वो भी फिर
आंदोलन करेंगे देश को नुकसान पहुंचाएंगे और सड़क पर उतर कर तांडव करेंगे। अगर जाट
को आरक्षण मिलता है तो पटेल को क्यों नहीं फिर काम, गुर्जर, मराठा, रेड्डी और भूमिहार को क्यों नहीं। जब
आरक्षण का स्तर जाति से ही तय किया जाता है तो हर जाति के पास आरक्षण जैसे संपत्ति
होनी चाहिए।
गुजरात में हार्दिक पटेल और हरियाणा
में बेनाम युवा चेहरे लाठी और माचिस लेकर खड़े हो गए हैं तो ये अभी शुरुआत मात्र
है इस मुल्क में युवाओं का सैलाब है। पहले से ही आरक्षण की आग में झुलसे युवा इसे
फिर मौके के रूप में लेकर सड़क पर कभी भी उतर सकते हैं। आज भ्रष्टाचार, अत्याचार और बेरोजगारी से लोग इस कदर झल्लाए हुए है कि उन्हें बस
एक माचिस की जरूरत है फिर आग ऐसी लगेगी की बुझाने में पानी खत्म हो जाएगा।

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