पार्ट- 2
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समय बदला और समय के गर्भ
से जब तस्वीर निकली तो लोगों के दिमाग में छप गई। लोग जेएनयू को क्रांति का अड्डा, लाल क्रांति
के खेत और विरोध का स्थल मानने लगें। देश के लोगों की जेएनयू से ये अपेक्षा होने लगी
कि ये वाम विचारों को आगे बढ़ाएगा साथ ही यहां हो रहे शोध से देश की अंधेरी जगहों पर
उजाला होगा।
लेकिन जो कुछ भी दिख रहा
है बात उससे कहीं अलग है जेएनयू में विचारों की क्रांति जो भी हो लेकिन जेएनयू मुख्यत: इस्टैबलिश्मेंट का काम करता रहा है और यहां से निकलने वाले छात्र देश के
विभिन्न विभागों के अनेक पद पर ख़ुद को स्थापित करते रहे। अगर हम एक नज़र डालते हैं
कि यहां के छात्र कहां कहां है तो तत्कालिन मोदी सरकार के कैबिनेट में भी जेएनयू से
निकले छात्र हैं। साथ ही राजदूत, विदेश
सचिव, राजनेता, पत्रकार
और तकरीबन हर क्षेत्र में जेएनयू के छात्र मिलेंगे। लेकिन अपने चर्चित तस्वीर यानि
की क्रांति के क्षेत्र में जेएनयू की भूमिका सबसे कम रही है।
लेकिन अब सवाल है कि ये
ग़लतफहमी किसने फैलाई कि जेएनयू क्रांति का गढ़ है यहां से विरोध की ही आवाज़ हमेशा
निकलती है? आज सरकार के लोग कहते फिर रहे हैं कि जेएनयू अब राष्ट्र विरोधी
हो गया है। यहां अब देश और समाज को तोड़ने की बात हो रही है। लोग अपनी मुग़ालते में
रहे इसलिए यहां के छात्र भी अपने आप को क्रांतिकारी कहने लगे साथ ही मज़लूम, दलित और सर्वहारों
का मददगार कहते रहे। लेकिन सच्चाई इससे काफी भिन्न है।
यहां के आबो-हवा में जो
विचार फैला हुआ है वो ऐसा है कि जब देश सिगरेट पीने का विरोध कर रहा था तब यहां खुलेआम
सिगरेट पीए जाते रहें। जब महिलाओं के लिए सामाजिक न्याय के लिए बेकार की बहस होती रही
तब यहां महिलाएं आत्मनिर्भर और सशक्त हो कर समाने आती रही। जब देश में सिखों को काटा
जा रहा था, भगाया जा रहा था तब जेएनयू ने सिखों को संरक्षण दिया। लेकिन राजनीतिक लड़ाई
में कभी ये विश्वविद्यालय हिंसक नहीं हुआ। मार-पीट की नौबत नहीं आई। लेकिन यही वैचारिक
खुलेपन इसकी कमज़ोर भी साबित हुई वैचारिक ख़ुलेपन की आड़ में यहां देश विरोधी विचारों
को भी हवा दिया गया। जेएनयू परिसर में अनेक भगोड़ों ने शरण लिया। इतिहास में कई उग्रवादी
भी यहां से पकड़े गए हैं।
विचारों के खुलेपन ने
भ्रमित करने वाले विचारों और देश विरोधी विचारों के लिए अच्छा माहौल तैयार किया। जिसका
नतीजा ये हुआ है कि आज यहां के छात्रों पर देशद्रोह का आरोप लगा है। कैंपस में देश
को तोड़ने का नारा लगाया गया। आंतकी की बरसी मनायी गई। साथ में न्याय व्यवस्था पर भी
गंभीर आरोप लगाए गए।
यह सच है कि दलित, पिछड़ों, मज़लुम और
हाशिए के लोगों के लिए यहां हमेशा चर्चा होती रहती है लेकिन सच तो ये है कि यहां से
इस तरह के जिम्मेदारी के लिए कोई भी आगे नहीं आया। जिसने भी इसकी बात करके आगे आने
की कोशिश की वो राजनीति से प्रेरित हो कर पहले अपने स्वार्थ को ही देखा। पिछले
40-50 सालों में जेएनयू ने कभी सर्व-साधारण तक जा कर उसकी मदद करने की कोशिश नहीं की।
लेकिन अब यहां चर्चा हो
रही है 'ज्यूडिकल किलिंग' पर, लेकिन इस
चर्चा का दुर्भाग्य ये रहा है कि ये चर्चा एक आतंकी के बिनाह पर हो रही है। क्या इस
देश में सिर्फ एक आतंकी ही कानून के हाथों मारा गया? क्या कश्मीर
की आज़ादी की मांग कर के कश्मीर को सुरक्षित बनाया जा सकता है? क्या भारत
की बर्बादी से 'तुम्हारी'
आबादी होगी? क्या भारत
के टुकड़े कर के महिला और सर्वहारा वर्ग को पूरी आज़ादी मिलेगी? क्या भ्रष्टाचार
ख़त्म होने तक जंग जारी रहेगा?
क्रमश:
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