Thursday, 18 February 2016

जेएनयू: जंग अभी जारी है...

पार्ट- 3
-----------------------------------------------------------------------------------------------
खेतों में किसान आत्महत्या कर रहें है। घर में बेटी महफ़ूज नहीं है। देश के युवा बेरोज़ागर हो रहे हैं। भ्रष्टाचार पर देश चुप बैठा हुआ है। शिक्षा का स्तर दिन--दिन नीचे गिर रहा है। स्वस्थ्य के प्रति लोग जागरुक नहीं हो रहे हैं। पर्यावरण की हालत ख़राब हो रही है। साथ ही धार्मिक उन्माद में चिताएं चल रही है लेकिन इस सब से इतर क्या देश के छात्रों के पास मुद्दा आतंक का समर्थन करने का ही मुद्दा है, देश को तोड़ने की बात सूझी है। कश्मीर की आज़ादी की पर बात कर रहे हैं? हद है !
अगर ऐसा है तो इस देश के भविष्य पर ग्रहण लग गया है। खालिख की चपेट में पूरा देश आ रहा है। क्योंकि कल तक देश को बढ़ाने के लिए सर्वहारों के लिए की जा रही लड़ाई अब आतंकी के समर्थन की हो गई है। क्या कल तक कश्मीर में शांति बहाली की बात करने वाले छात्र आज आज़ाद कश्मीर की मांग करने लगें है। आख़िर आचानक ये सब क्यों हो गया। जेएनयू से देशविरोध में निकली आवाज़ के क्या सही मायनो में जेएनयू की आवाज़ है।
नहीं... ये पूरा सच नहीं है। भारत के छात्र देशद्रोही नहीं हो सकते और ना ही कश्मीर की आज़ादी की मांग कर सकते हैं। लेकिन पूरे प्रकरण को देखने के बाद ऐसा लग रहा है कि इसमें सियासी हस्तक्षेप है, कुछ लोग सियासी फायदा उठाने के लिए इसे सियासी रंग देने का प्रयास कर रहे हैं। जेएनयू के इस मुद्दे पर आज देश में जो भी हालात बनी हैं उससे कुछ 'सियासी जेहादी' अपने हित साधने का काम कर रहे हैं। लेकिन सियासत की ये तस्वीर छात्रों की छवि पर दाग लगा रही है। ये बदलते दौर की बदलती राजनीति है जो कुछ तथाकथित छात्रों का अपना व्यक्तिगत हित साधने का साधन मात्र है ये वही हैं जो छात्रों के बीच छात्र का चोला पहने बैठे हुए है लेकिन उनका मकसद ना तो देश हित है ना ही समाज हित ये वो छात्र हैं जो किसी ना किसी वज़ह से अपने आपको कतार में आगे करके अपनी महत्वकांक्षा साधना चाहते हैं। अपने आप को समाज में लेमलाइटेड करना चाहते हैं। यही वज़ह है कि लिंक से हट कुछ करने को बेताब ये सो कॉल्ड स्टूडेंट देश के विरोध में जा कर देश के समाने अपने आप को खड़ा करना चाहते हैं।
आज मीडिया के कैमरे पर आने के लिए हर कोई बेताब होता है क्योंकि आज के दौर में संचार के माध्यम इतने प्रबल हो चुके हैं कि एक मिनट के अंदर में आप कन्याकुमारी से कश्मीर तक पहुंच सकते हैं। और इसका फायदा हर कोई उठाना चाहता है। यही वज़ह है कि जेएनयू में सो कॉल्ड स्टूडेनट ने देश विरोधी नारे लगाए और देखते ही देखते आज पूरे देश में उनका नाम जुवां-जुवां पर है।
जेएनयू का प्रकरण एक सोची समझी राजनीति का हिस्सा है। ना कि अचानक भड़की देश विरोध की आग। क्योंकि अगर हम जेएनयू की राजनीति को जानेंगे तो पता चलेगा कि जेएनयू कभी भी सरकार के विरुद्ध काम ही नहीं किया । जेएनयू के संप्रदायिकता का आधार ब्राह्मण और हिदुत्ववादी विचारधार का विरोध करना रहा है। संघ से जोड़कर और वैचारिक अभिव्यक्ति की आड़ में हिंदुत्ववादी विचारों को लगभग जेएनयू में बैन ही कर दिया गया था। क्योंकि कांग्रेस और वाम दलों की सरकार से ही जेएनयू को हर सुविधा मिलती रही है। इसी वज़ह से जेएनयू हमेशा सत्ता के निकट रहा है।
अगर ऐसा नहीं होता तो अफजल की मौत की बरसी तो हर साल आती है और तब भी आई थी जब कांग्रेस की सरकार थी साथ ही अफजल को संप्रग सरकार के शासनकाल में ही फांसी पर चढ़ाया गया था लेकिन विरोध तब नहीं हुए, ना ही देश विरोध की आवाज़ कहीं से सुनाई दी लेकिन अब जब सरकार बदली है, लोग बदले हैं, सिस्टम बदला है... कल तक चुप रहने वाले बोलने लगे हैं, जिस पर बैन लगी हुई थी वो आगे आ कर खड़े हो गए है साथ ही इनकी अय्याशी पर भी अचानक ब्रेक लगने लगा तो बौखलाहट जायज़ है। अब जब सब बंद हो रहा है तो बौखलाहट में ये लोग सीधे तौर पर देश को तोड़ने के बात करने लगे। क्योंकि उनके लिए हिंदुस्तान अब पाकिस्तान जैसा हो गया। इसलिए पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी इनके द्वारा लगाए गए।
ये तो जेएनयू कि बात है लेकिन जेएनयू के कुछ सो कॉल्ड छात्र दिल्ली के साथ अन्य कई शहरों के विश्वविद्यालय में अपने साथियों को सक्रिए कर दिए और अचानक हल्ला बोलने की साजिश में जुट गए। अब जब पुलिस इन लोगों के खोजने लगी और गिरफ्तार करने के लिए जगह-जगह छापे मारने लगी तो ये अपने साथियों को हल्ला बोलने के लिए आगाह कर दिए। फिर दिल्ली के बाद कोलकाता में भी देश विरोध के नारे लगाए गए। लेकिन विरोध करते इन छात्रों से मीडिया ने जब विरोध की वज़ह के बारे में पूछा तो वो अबाक रह गए...उन्हें ये भी नहीं पता कि नारे में जिसका ज़िक्र वो कर रहे हैं वो है कौन ! वो तो बस कैमरे की चाहत में इस टाइप के नारे लगाने लगे।
अब आगे की कहानी आप ख़ुद समझ सकते हैं। लेकिन सच को कभी दबाना नहीं चाहिए। इस मामले में जो सच है उसे पूरे देश के सामने लना ही चाहिए। इस मामले की नि:पक्ष जांच होने चाहिए और जांच के बाद जो भी दोषी पाए जाए उसके साथ देशद्रोही जैसा व्यवहार होना चाहिए। लेकिन अतिउत्साह में आ कर किसी को भी दोषी नहीं बनाया जाए।
पटियाला हॉउस कोर्ट के सामने का जो नाजारा देखने को मिला वो बेहद ही दुख:द है। कन्हैया कुमार पर अभी तक दोष सिद्ध नहीं हुए लेकिन वकिलों के एक समूह ने कन्हैया के साथ मारपीट की जो लोकतंत्र को शर्मशार करता है। हमसब को धीरज से काम लेने चाहिए साथ ही अपना फर्ज कभी नहीं भूलना चाहिए।
विरोध होने चाहिए लेकिन विरोध करते वक्त ये ध्यान रहे कि विरोध से सिर्फ उस मुद्दे पर ही चोट पड़े जिसके लिए विरोध हो रहा है। अभिव्यक्ति की आज़ादी हमें है लेकिन इसकी भी हद है। हमारा संविधान भारत सरकार के विरोध करने की इज़ाजत देता है भारत का नहीं। हमें इस फर्क को हमेशा याद रखना होगा। जब इस फर्क हम को भूलते हैं तभी अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा को लांघते हैं।



No comments:

Post a Comment