पार्ट-1
हर मुद्दे पर 1.5 अरब की आबादी एक हो ये हो नहीं सकता है।
लेकिन एक मुद्दा है जिस पर ये पूरी आबादी एक हो सकते हैं। वो है राष्ट्रीय एकता, अखंडता और
समरसता। आज़ादी मिली है तो इसका उपयोग एक सफल, सुखद और समृद्ध
राष्ट्र के निर्माण के लिए होना चाहिए। लेकिन आज़ादी का बेजा इस्तेमाल इसकी प्रतिष्ठा
को ठेस पहुंचाता है। हम हर मुद्दे पर अलग राय रख सकते हैं लेकिन जिस मिट्टी से हमारा
भरण-पोषण होता है हमारा उसके ख़िलाफ जाना हमारे ईमान पर सवाल उठाता है।
समस्या जो भी हो लेकिन हमारा सविंधान और हमारी ज़मीर कभी
भी इसके ख़िलाफ़ जाने की इज़ाजत नहीं देती। देश के ख़िलाफ़ बोलना अपने अस्तित्व के
ख़िलाफ बोलने के बराबर है। भारत जो कि धर्मनिर्पेक्ष देश है वहां सामाजिक विषमता और
कुंठा के कारण अनेक तरह की समस्याएं हैं। फिर भी इसकी अखंडता बरकरार है लेकिन जब बात
इसे तोड़ने की हो रही हो तो फिर मामला ज्यादा ही गंभीर हो जाता है।
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु भारत की आंतरिक
स्थिति को देखते हुए उन्होंने शिक्षा को सबसे पहले स्थान पर रखा क्योंकि जबतक मुल्क
शिक्षित नहीं होगा तब तक ये अपनी उन्नति और प्रगति नहीं कर सकता। इस समस्या के ध्यानार्थ
नेहरु जी ने जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की नींव रखी। संसद में जेएनयू अधिनियम
1966 लाकर जेएनयू विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। लेकिन नेहरु जी इसका उद्घाटन नहीं
कर सके। लेकिन 1969 में औपचारिक रूप से तात्कालीन राष्ट्रपति स्व. वी.वी गिरी ने जेएनयू
का उद्घाटन किया। जिसका मुख्य उद्धेश्य मानवता, सहनशीलता, तर्कशीलता, चिन्तन
प्रक्रिया और सत्य की खोज की भावना को स्थापित करना होता है। इसका उद्देश्य मानव जाति
को निरन्तर महत्तर लक्ष्य की ओर प्रेरित करना है।
जेएनयू अपने स्थापना वर्ष के बाद अपने उद्धेश्य की हमेशा
पूर्ति करते आया है और हमें उम्मीद है आगे भी देश की सेवा और समृद्धि में इसकी भूमिका
सराहनीय रहेगी। यहां के छात्र हमेशा बौद्धिक विचार वाले रहे हैं जो समाज में चल रही
कूरितियों का हमेशा विरोध करते रहे हैं साथ ही समाज के हाशिए पर चल रहे लोगों के ह़क
के लिए आवाज़ बुलंद करते रहे हैं। विचारधारा कुछ भी हो लेकिन इनका मकसद एक ही रहा है
राष्ट्र की उन्नति और प्रगति। यहां के प्रबुद्ध छात्रों ने देश के दबे कुचले दलित मज़लूमों
की अव़ाज़ को अपना साथ दे कर देश के मुख्यधारा के लोगों तक पहुंचाने का काम किया है।
जिसका परिणाम हुआ कि आज कई मज़बूर,
मज़लूम और हाशिए के लोग मुख्यधारा
के साथ जुड़े।
लेकिन अब जब दौर बदला तो सबकुछ बदला, लोग बदलें, हालात बदला, सियासत बदली
और इसके साथ जिम्मेदारी और मौलिकता भी बदली। जेएनयू इस बदलते हुए हालात को भांप रहा
था और बदलते दौर के साथ बदली मौलिकता के विरोध में अपनी आव़ाज़ को और जोर कर दिया।
क्योंकि जब मौलिकता का आधार एक पहलू को देख कर किया जाता है तो तस्वीर बदत्तर होती
है। और वही हुआ देश भीषण राजनीति के चपेट में आता गया और देश के अंदर की तस्वीर बद
से बदत्तर होती चली गई।
लेकिन आज सवाल ये है कि क्या विरोध का भी स्तर बदल चुका है
क्या नारे में ज़हर घोल दिया गया। क्या सिस्टम के ख़िलाफ हो रहा जंग अब देश के ख़िलाफ
हो गया। क्या यहां के छात्रों की गतिविधियां देश के ख़िलाफ है या फिर एक प्रतिष्ठित
संस्थान की प्रतिष्ठा को बदनाम करने की साजिश है। और शिक्षा के ख़िलाफ एक सोची-समझी
गंदी राजनीति, जिसका शिकार अब होनहार क़ाबिल ग़रीब छात्र हो रहे हैं। बहुत जरूरी है
कि इसका पूरा सच पूरे देश के सामने आएं।
क्रमश:

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